Thursday, 31 August 2017

BANK OF MAHARASHTRA LOCK IN BHOKARDAN CITY




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भोकरदनमध्ये महाराष्ट्र बँकेला ठोकले टाळे!

शेतकऱ्यांसह ग्राहकांना सापत्न वागणूक

येथील  बँक ऑफ महाराष्ट्रच्या शाखेत शेतकरी व ग्राहकांना अधिकारी - कर्मचाऱ्यांकडून सापत्न वागणूक देण्यात येत असून सामान्य नागरिकांची कामे करताना टाळाटाळ केली जात आहे. दरम्यान, आज बँकेचे रोखपाल यांनी ग्राहकांचे काम करण्यास टाळाटाळ करून अवमानकारक भाषा वापरल्याबद्दल राहत फाउंडेशनच्या कार्यकत्यांर्ंनी बँकेला टाळे ठोकून संताप व्यक्त केला..
महाराष्ट्र बँकेत शेतकरी व ग्राहकांना सापत्न वागणूक देऊन त्यांची कामे करण्यास अधिकारी व कर्मचारी नेहमीच वेळक ाढूपणाचा अवलंब करीत आहेत. परंतु एखादी श्रीमंत अथवा व्यापारी व्यक्ती आली तर त्यांची कामे कॅबिनमध्ये बसून केली जातात. बऱ्याच वेळा बँक कर्मचारी व अधिकारी या लोकांच्या कामांना विशेष प्राधान्य देऊन सर्वसामान्य ग्राहक व शेतकरी यांची कामे टांगणीला ठेवताना दिसून येत आहेत. त्यामुळे शेतकरी व सर्वसामान्य नागरिकांचा बराचसा वेळ वाया जात आहे. सध्या शेतकरी शेतीची कामे बाजूला ठेवून बँकेत व्यवहार करण्यासाठी येत असतात. परंतु बँकेच्या कर्मचाऱ्यांकडून त्यांना चांगली वागणूक मिळत नाही. बऱ्याच वेळा बँकेच्या कर्मचारी व ग्राहकांमध्ये वाद उफाळून येत असतात. त्यातून बँकेच्या कामकाजावर परिणाम होताना दिसून येतो. सर्वसामान्य माणसांना बँकेच्या क्षुल्लक कामासाठी वारंवार चकरा माराव्या लागत आहेत. त्यामुळे वेठीस धरलेल्या ग्राहकांमध्ये संताप व्यक्त होत आहे. दरम्यान, बँकेतील रोखपाल यांनी ग्राहकांना अरेरावीची भाषा वापरल्याबद्दल राहत फाउंडेशनच्या कार्यकर्त्यांनी जाब विचारून थेट बँकेला कुलूप ठोकले आहे. संबंधित कर्मचाऱ्यावर कार्यवाही करण्यात यावी, अशी मागणी अनिस भारती, सुनील गायकवाड, हरिदास शिंदे यांनी केली आहे..

Tuesday, 29 August 2017

भोकरदन शहरा मध्ये महाराष्ट्र बँकला ठोकले टाळे.

न्युज बघा




भोकरदन शहरात महाराष्ट्र बँकेत नागरिकांचे काम होत नसल्याने व कॅशियर रामदास शेळके यांनी आरेरावीची भाषा वापरल्याने येथील महाराष्ट्र बँकेला राहत फाउंडेशन भोकरदन च्या वतीने टाळे लावण्यात आले यावेळी राहत फाउंडेशनचे अध्यक्ष अनिस भारती यांनी सांगितले की, बरेच लोक काम धंधा सोडून बँकेत दिवस घालवतात पण त्यांचे काम होत नाही बँकेतील कर्मचारी गोरगरीब नागरिकांशी आरेरावीची भाषे मध्ये बोलतात व शिवीगाळ करतात व तसेच जनतेचे काम लवकर करत नाही जर एखादा पैशाने मोठा माणूस आला तर त्याचे काम बँक मनेजर स्वत:चे केबिन मध्ये नेवून काम करून देतात आणि गोरगरीब जनतेला कोर्टा प्रमाणे तारीख पे तारीख दिले जाते गरीब जनतेला कोणी कुत्रा म्हणतो तर कोणी काय म्हणतो.कर्मचा-यावर कार्यवाही व्हावी असे अनिस भारती यांचे म्हटले यावेळी अनिस भारती,सुनील गायकवाड,हरिदास शिंदे उपस्थीत होते.

Thursday, 10 August 2017

क्या आपको मालूम है, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी 1915 में बनी ‘आज़ाद’ सरकार मे Home Minister की हैसियत रखते थे..??

क्या आपको मालूम है, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी 1915 में बनी ‘आज़ाद’ सरकार मे Home Minister की हैसियत रखते थे..??











10 मार्च 1872 को स्यालकोट (पंजाब) मे एक सिख घराने मे एक लडके ने जन्म लिया , बाप लडके के पैदा होने से पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह चुका था ! जब लडके ने कुछ होश सम्भाला तो माँ ने उसे पढ़ने के लिए मामा के पास (सिंध) भेज दिया वहाँ उस लडके के ताललुकात कई फ़क़ीरों से और सूफ़ियों से हुआ , सूफ़ियों की तालीम उसे इस्लाम की तरफ़ खींचती और एक दिन वह अपना घर छोड़ कर भाग खड़ा हुआ और सिंध के एक बुज़ुर्ग के हाथ पर इस्लाम को कबुल किया या दुसरे लफ़्ज़ मे कहे तो लडके ने अपने दिल की बात को ख़ुद से मनवा लिया । अपना नाम Ubiadullah रखा ।
25 बरस की उम्र तक मौलाना Ubaidullah सिंधी ने सूफ़ियों और ख़ानकाहो मे इल्म सीखते रहे उसके बाद देवबंद चले आए , यहाँ शेख़ उल हिन्द रह अल से मुलाक़ात हुइ , और छह साल तक देवबंद मे इल्म हासिल किया , फिकह , Logic और फ़लसफ़े मे महारत हासिल करने के बाद वापस सिंध लौट गये । प्रथम विश्व युद्ध के समय मौलाना , शैख़ उल हिन्द रह अल के कहने पर काबुल आ गये और देवबंद की सियासी तहरीक रेशमी रुमाल मे शामिल हो गये और फिर अफ़ग़ान के सरदार हबीबुल्ला खान की मदद से राजा महेन्द्र प्रताप की प्रवासी सरकार की स्थापना की गइ ।
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मौलाना Ubaidullah उस सरकार मे Home Minister की हैसियत से थे ! मौलाना लगभग सात साल काबुल मे रहे , प्रथम विश्व युद्ध के बाद हालात ख़राब हो चुके थे , जर्मनी बिखर चुका था तो रुस अपने घर मे ही क्रान्ति के दौर से गुज़र रहा था ।
मौलाना रुस को रवाना हो गये अपनी आँखो के सामने रुस के क्रान्ति को देखने , लेनिन से कभी मिल तो नही पाए लेकिन रुस की क्रान्ति ने मौलाना की ज़िन्दगी मे नया इनक़लाब ला चुका था 1923 मे मौलाना वहाँ से तुर्की चले गये वहाँ भी कमाल पाशा के हाथ तुर्की नई ज़िन्दगी की शुरुआत कर रहा था , मौलाना पर वामपंथी विचारधारा का कितना असर हुआ था ये कहना आसान नही लेकिन मौलाना वामपंथी विचारधारा को Unnatural मानते थे । तुर्की से मौलाना मक्का की तरफ़ निकल गये , वहाँ आल सउद की हुकूमत बन चुकी थी , लगभग दस साल तक मौलाना वहाँ रहे , पढ़ने पढ़ाने का काम जारी रखा ! दिल मे एक कसक थी वतन लौटने की , लौटना आसान नही था आख़िर 1936 मे कांग्रेस की मदद से अंग्रेज़ की प्रमिशन वतन लौटने की मिली , और मौलान 1938 मे कराची लौट आए ।
मौलाना कांग्रेस के कभी मेमबर नही रहे उसके बाद भी मौलान कांग्रेस के आसपास ही रहे , वक़्त को हालात को देखते हुए मौलाना अंग्रेज़ के ख़िलाफ़ गांधी जी के हथियार अहिंसा को सही मानते थे ! 1944 मे मौलाना अपने बेटी से मिलने वापस पंजाब जाते है वही बिमार हो जाते है और 22 अगस्त 1944 को इस दुनिया को अलविदा कह जाते है ।
कुछ बातें मौलाना Ubaidullah सिंधी रह अल के ज़बान से ,,,,,,,,,,,,
एक दिन मौलाना बड़े गमगीन से थे ,और कहने लगे मैं मुसलमानों को ज़रूरत की बातें कहता हुँ ! लेकिन वो सुनते नही बल्कि उलटा मुझे बुरा भला कहते हैं ! मैं सोलह बरस का था जब मैं घर छोड़ कर निकल आया था ! मेरा ख़ानदान बहुत बड़ा न था और न ही हमारे यहाँ दौलत की भरमार थी लेकिन मेरी माँ थी मेरी बहन थी और उनकी मोहब्बत मेरे दिल मे थी लेकिन इस्लाम से मुझे इतनी मोहब्बत थी मैंने किसी को ख़ातिर न लाया ! खुदा जानता है माँ को छोड़ने से मुझे किस क़दर ज़हनी तकलीफ़ हुइ थी ।
हज़रत शेख़ उल हिन्द रह अल ने मुझे इस्लाम सिखाया और उनके ज़रिए मैंने शाह वलीउलाह की तालीमात हासिल की , क़ुरान समझा और दीन इस्लाम की हक़ीक़त को समझा ! अब अगर मैं मौजूद मज़हबी तबक़ों के ख़िलाफ़ कोइ बात कहता हुँ , तो उसे ये समझना के मैं मज़हब के ख़िलाफ़ हुँ किस क़दर ग़लत है ! मैंने दुनिया की अज़ीज़ अपनी माँ की मोहब्बत को छोड़ कर मज़हब की मोहब्बत को अपनाया , उम्र भर तकलीफ़ और मुसीबत झेलने के बाद भी मुझे मुसलमान होने पर फ़ख़्र है ।
( मौलाना Ubaidullah सिंधी की हालत जिनदगी , उनकी तालीमात और उनकी सियासी फ़िकर पर प्रोफ़ेसर मोहम्मद सरवर साहब ने एक किताब लिखी है , किताब पढ़ने के बाद इस नतीजे पर हु उनकी जिनदगी को किसी एक पोस्ट मे समाया नही जा सकता , Political Science के स्टूडेंट्स के लिए उनकी जिनदगी मे बहुत कुछ है , जो लोग इस देश मे गंगा जमनी तहज़ीब को बचाना चाहते हैं उनके लिए भी मौलाना की ज़िंदगी मे बहुत कुछ है और जो लोग सुफिसम को समझना चाहते है ,मज़हब को समझना चाहते है उनके सीखने और समझने के लिए मौलाना की जिनदगी मे बहुत कुछ है ।)
Kamran Ibrahimi
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Maulana Ubaidullah Sindhi
Born in a Uppal Khatri family of Sialkot on March 10, 1872, he was a political activist of the Indian independence movement and one of its leaders. His father Ram Singh Zargar died four months before Ubaidullah was born. Ubaidullah converted to Islam early in his life after reading books on Islam and later enrolled in the Darul Uloom Deoband, where he was at various times associated with other noted Islamic scholars of the time, including Maulana Rasheed Gangohi and Mahmud al Hasan. Maulana Sindhi returned to the Darul-Uloom Deoband in 1909, and gradually involved himself in the Pan-Islamic movement. During World War I, he was amongst the leaders of the Deoband School, who, led by Maulana Mahmud al Hasan, left India to seek support of the Central Powers for a Pan-Islamic revolution in India in what came to be known as the Silk Letter Movement. A movement organised by the Deobandi leaders between 1913 to 1920, aimed at freeing India from the British rule by allying with Ottoman Turkey, Imperial Germany, and Afghanistan.
Maulana Sindhi reached Kabul during the war to rally the Afghan Amir Habibullah Khan, and after brief period, he offered his support to Raja Mahendra Pratap’s plans for revolution in India with German support. He joined the Provisional Government of India formed in Kabul in December 1915, and remained in Afghanistan until the end of the war, and left for Russia. He subsequently spent two years in Turkey and, passing through many countries, eventually reached Hijaz (Saudi Arabia) where he spent about 14 years learning and pondering over the philosophy of Islam especially in the light of Shah Waliullah’s works. In his early career he was a Pan-Islamic thinker. However, after his studies of Shah Waliullah’s works, Ubaidullah Sindhi emerged as non-Pan-Islamic scholar. He was one of the most active and prominent members of the faction of Indian Freedom Movement led by Muslim clergy chiefly from the Deoband.
He was very active in covert anti-British propaganda activities during this time. This led to his alienization by Deoband leaders. In 1912 he moved to Delhi and started another institution by the name of Nazaaratul Ma’aarif. . In 1915 he left for Kabul from where he started the “Silk handkerchief” movement. This was a landmark movement in the process of Indian independence. He travelled to Moscow and later Turkey and eventually came home after living in Mecca for 13 years.
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In 1936, the Indian National Congress requested his return to India and the British Raj subsequently gave its permission. He remained at Delhi, where he began a programme teaching Shah Waliullah’s Hujjatullahil Baalighah to Akbarabadi, who would then write an exegesis in his own words. Ubaidullah left for Rahim Yar Khan to visit his daughter in 1944. At Deen Pur (Khanpur), he was taken seriously ill and died on 22 of August 1944 at Deen Pur.
(wikipedia.org)

INDEPENDENCE DAY 15 AUG 1947



अंग्रेज़ों ने जंगे आज़ादी में अपना सबसे बड़ा दुश्मन मौलवी अहमदुल्लाह शाह फ़ैज़ाबादी को माना था.

मतलबपरस्ती की इस दुनिया में किसी भी जननायक को भुला देने के लिए 158 साल कम नहीं होते। जब हमारे ही लोग उस गौरवशाली विरासत की शानदार धरोहर को सहेज कर न रख पा रहे हों तो सत्ता को कोसने का क्या मतलब…?
दरअसल, इतिहास की भी दो किस्में हैं: एक तो राजा, रजवाड़े, रियासतों, तालुकेदारों, नवाबों, बादशाहों, शहंशाहों का और दूसरा जनता का। सत्ता का चरित्र होता है कि वह अपने फ़रेब, साजिशों और दमन के सहारे हमें बार-बार आभास कराती है कि जनता बुजदिल, कायर होती है और जनता के बलिदानों का कोई इतिहास नहीं है। हमारे लोग भी जाने-अनजाने ऐसी साजिशों का हिस्सा बन जाते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर हम सब कुछ भूलने पर ही उतारू हो जाएं. तो भला याद क्या और किसे रखेंगे ?
एक ऐसा स्वतंत्रता सेनानी जिसे इतिहास के पन्नो में दफ्न कर दिया गया- 
1857 में जब पूरा हिंदुस्तान अंग्रेजों के जुल्मों सितम से परेशान था और बगावत के सिवा उनके पास कोई चारा नही बचा था इसी वक़्त में एक ऐसा शख्श भी था जिसने अंग्रेजों के नाक में दम कर रखा था , दम भी इतना की अंग्रेजों ने उन्हें जिन्दा या मुर्दा पकड़ के लाने वाले को 50000 इनाम के तौर पर देने का ऐलान कर दिया। फिर भी अंग्रेजी हुकुमत उन्हें कभी जिन्दा नही पकड़ पाई ।
पहली जंग-ए-आज़ादी के सबसे काबिल पैरोकार एक सूफी-फ़कीर थे। जब आज़ादी की कहीं चर्चा भी नहीं थी उस वक्त फिरंगियों की बर्बरता के विरुद्ध उन्होंने पर्चे लिखे, रिसाले निकाले और देश में घूम-घूम कर अपने तरीके से लोगों को संगठित किया। वे मौलवी हाफिज अहमद उल्लाह शाह, सिकंदर शाह, नक्कार शाह, डंका शाह आदि नामो से मशहूर थे। जैसे उनके कई नाम थे ठीक वैसे ही उनकी शख़्सियत के कई आयाम भी थे।
1857 की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि अंग्रेजों की ‘डिवाइड एंड रूल’ नीति को धता बता कर हिन्दू-मुसलमान कदम से कदम मिलाकर साथ-साथ लड़े थे। हर मोर्चे पर हालात यह थे कि इंच-इंच भर जमीन अंग्रेजों को गवानी पड़ी या देशवासियों के लाशों के ऊपर से गुज़रना पड़ा। सवाल उठता है कि फिर हम हार क्यों गए? वजह साफ़ है कि ऐसे नाज़ुक दौर में हवा का रुख देखकर आज़ादी में शामिल हुए नायक ‘खलनायक’ बन गए और ऐन मौके पर अपनी गद्दारी की कीमत वसूलने दुश्मनों से जा मिले। इसी विश्वासघात की वज़ह से जंगे आज़ादी के सबसे बहादुर सिपहसालार मौलवी को शहादत देनी पड़ी। 1857 का सबसे बड़ा सबक यह है कि ‘आप बिकेंगे तो हर मोर्चे पर हारेंगे।’
मौलवी को कलम और तलवार में महारत हासिल होने के साथ ही आम जनता के बीच बेहद लोकप्रियता प्राप्त थी। इस योद्धा ने 1857 की शौर्य गाथा की ऐसी इबारत लिखी जिसको आज तक कोई छू भी नहीं पाया। पूरे अवध में नवंबर 185 6 से घूम-घूम कर इस विद्रोही ने आज़ादी की मशाल को जलाए रखा जिसकी वजह से फरवरी 1857 में उनके सशस्त्र जमावड़े की बढ़ती ताकत को देखकर फिरंगियों ने कई लालच दिए, अपने लोगों से हथियार डलवा देने के लिए कहा तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया। इस गुस्ताखी में फिरंगी आकाओं ने उनकी गिरफ्तारी का फ़रमान जारी कर दिया। मौलवी की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अवध की पुलिस को मौलवी को गिरफ्तार करने से मना कर दिया गया। 19 फरवरी 1857 को अंग्रेज़ी फौजों और मौलवी में कड़ी टक्कर के बाद उन्हें पकड़ लिया गया। बागियों का मनोबल तोड़ने के लिए घायल मौलवी को सिर से पांव तक जंजीरों में बांधकर पूरे फैज़ाबाद शहर में घुमाया ही नहीं गया बल्कि फांसी की सजा सुनाकर फैज़ाबाद जेल में डाल दिया गया।
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क्रांति का पौधा जो उन्होंने रोपा था उसका असर यह हुआ कि 8 जून 1857 को सूबेदार दिलीप सिंह के नेतृत्व में बंगाल रेजिमेंट में बगावत का झंडा फहरा कर फैज़ाबाद की बहादुर जनता ने भी बग़ावत कर दी। हज़ारों हज़ार बागियों ने फैज़ाबाद जेल का फाटक तोड़कर अपने प्रिय मौलवी और साथियों को आज़ाद कराय। पूरे फैज़ाबाद से अंग्रेज़ डरकर भाग खड़े हुए। फैज़ाबाद आज़ाद हो गया।
मौलवी की रिहाई का जश्न मनाया गया और उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गयी। फिर तो मौलवी ने सिर्फ फैज़ाबाद तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखा बल्कि पूरे अवध-आगरा में जमकर अपनी युद्धनीति का करिश्मा दिखाया। फ़रारी के दिनों में मौलवी को सुनने कई हजार की भीड़ जमा हो जाती थी। प्रसिद्ध पुस्तक ‘भारत में अंगरेज़ी राज़’ के लेखक पंडित सुन्दरलाल लिखते हैं कि ‘वास्तव में बगावत की उतनी तैयारी कहीं भी नहीं थी जितनी अवध में। हजारों मौलवी और हजारों पंडित एक-एक बैरक और एक-एक गांवं में स्वाधीनता युद्ध के लिए लोगों को तैयार करते फिरते थे।’ इतिहासकार होम्स ने उत्तर भारत में अंग्रेजों का सबसे जबदस्त दुश्मन मौलवी अहमदुल्लाह शाह को बताया है।
फ़ैजाबाद के ताल्लुकदार घर में पैदा हुए मौलाना अहमदुल्लाह शाह हैदराबाद से पढाई पूरी करके बहुत कम उम्र में ही लेखक और धार्मिक उपदेशक बन गए। अंग्रेजों के हाथों अवध को आज़ाद करने के लिए उन्हें लोगों को अंग्रेजों के खि़लाफ भड़काने के लिए अपहरण कर लिया गया जिससे आहत होकर मौलाना साहब ने देश पर अपना सब कुछ अपनी जान के साथ लुटाने की क़सम खा ली।
वे मौलवी बन गए और पुरे हिंदुस्तान को जगाने के लिए निकल पड़े। लोगों का मानना था की उनके एक हाथ में तलवार तो दुसरे में कलम है।
वे क्रन्तिकारी पम्पलेट लिखते जिसमे वे अवाम से अंग्रेजो के खिलाफ जिहाद करने की अपील करते और उसे खुद गाँव गाँव जाकर बांटते। 1857 के जंग ए आजादी की एक बेशकीमती दस्तावेज के तौर पर एक ऐलान नामा “फ़तहुल इस्लाम” के नाम से मिली। इस पत्रिका को निकलने वाले का नाम तो नही मिला पर उस पत्रिका के मौजू (विषय) और विवरण से ये अंदाजा लगा की उसे मौलाना अहमदुल्लाह शाह जो फ़ैजाबाद के मौलवी के नाम से मशहूर थे उन्होंने ही लिखी थी।
इस पत्रिका में अंग्रेजों के जुल्म की दास्तान लिखने के बाद अवाम से जिहाद करने के लिए दर्खाश्त की गयी थी। पत्रिका में अवाम को जंग के तौर तरीके और और नेतृत्व के बारे में समझाने की कोशीश की गयी है जो दिलचस्प है। आगे उस पत्रिका में गैर मुस्लिमो को मुखातिब करते हुए लिखा गया है की वही हिन्दू अब भी है और अभी भी वही मुसलमान। वो अपने दिन पर कायम रहे और हम हमारे दिन पर, अगर हम उनकी हिफाजत करेंगे तो वो भी हमारी हिफाजत करेंगे। ईसाईयों ने हिन्दू और मुसलमानों को ईसाई बनाना चाहा पर अल्लाह ने हमे बचा लिया उलटे वो खुद ही खराब हो गये। इस पत्रिका के अंत में अंग्रेजों से किसी भी तरह का सम्बन्ध रखने से मना किया गया है और गुजारिश की गयी है की कोई भी हिंदुस्तानी अंग्रेजों के पास नौकरी ना करे।
मौलाना साहब खुद अपने लिखे हुए क्रांतिकारी पर्चे को गाँव गाँव जाकर पहुचाते। 1856 में मौलाना साहब जब लखनऊ पहुचे तो पुलिस ने उनके क्रांतिकारी गतिविधियों को रोक दिया। प्रतिबन्ध के बावजूद जब उन्होंने लोगों को आज़ादी की लड़ाई के लिए उकसाना बंद नही किया तो 1857 में उन्हें फ़ैजाबाद में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।
जेल से छूटने के बाद उन्होंने लखनऊ और शाहजहापुर में लोगो को फिर से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए जगाना शुरू कर दिया । जंग ए आज़ादी के दौरान मौलाना साहब को वोद्रोही स्वतंत्रता सेनानियो की उस 22वीं इन्फेंट्री का प्रमुख बनाया गया जिसने चिनहट की प्रसिद्ध लड़ाई में हेनरी लारेंस के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना से एक बहुत ही जबरदस्त जंग लड़ा।
इस जंग में ब्रिटिश सेना को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा । जंग के बाद उन्हें जीते जी ब्रिटिश इंटेलिजेंस और पुलिस नही पकड़ पाई और वो जीते जी अवाम के हर दिल अज़ीज़ बन गए।
लोगों का मानना था की मौलाना साहब में कोई जादुई शक्ति या ईश्वरीय शक्ति है जिसके कारण अंग्रेजों को उन्हें पकड़ना या मारना नामुमकिन था। हर मोर्चे पर फिरंगियों को भागना पड़ रहा था, तब 12 अप्रैल 1858 को गवर्नर जनरल कैनिंग ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए 50, 000 रुपये ईनाम का एलान किया जिस पर भारत के सचिव जी. एफ. ऐडमोंस्टन के दस्तखत थे। इसी इनाम के लालच में पुवायां के अंग्रेज परस्त राजा जगन्नाथ सिंह न उन्हें आमंत्रित कर 15 जून 1858 को धोके से उन्हें गोली मार कर शहीद कर दिया। चुंके मौलवी से पुवायां का राजा जगन्नाथ अपनी दोस्ती का दम भरता था। मौलवी राजा से मदद मांगने जब पुवाया पहुंचे. तो उन्हें दाल में कुछ काला लगा लेकिन इस बहादुर ने वापस लौटना अपनी शान के खिलाफ समझा। पैसों और रियासत की लालच में धोखे से मौलवी को शहीद कर दिया गया। उनके सिर को काटकर अंग्रेज़ जिला कलक्टर को राजा ने सौंपा और मुंहमांगी रकम वसूल की। इस विश्वासघात से देश के लोग रो पड़े। फिरंगियों ने अवाम में दहशत फैलाने की नीयत से मौलवी का सिर पूरे शहर में घुमाया और शाहजहांपुर की कोतवाली के नीम के पेड़ पर लटका दिया। यह अलग बात है कि कुछ जुनूनियों ने रात में सिर को उतारकर लोधीपुर गांव के नज़दीक खेतों के बीच दफना दिया जहां आज भी मौलवी का स्मारक मौजूद है।
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मौलाना साहब पर लिखते हुए ब्रिटिश अधिकारी थॉमस सीटन ने लिखा था – ‘ a man of great abilities of undaunted courage of stern determination and by far the best soldier among the rebels’
अंग्रेजों का आधिकारिक इतिहास लिखने वाले के. मालीसन ने लिखा कि :- ‘मौलवी एक असाधारण आदमी थे। विद्रोह के दौरान उसकी सैन्य क्षमता और रणकौशल का सबूत बार-बार मिलता है। उनके सिवाय कोई और यह दावा नहीं कर सकता कि उसने युद्धक्षेत्र में कैम्पबेल जैसे जंग में माहिर उस्ताद को दो-दो बार हराया और न जाने कितनी बार गफ़लत में डाला और उनके हमले को नाकाम किया। वह अपने देश के लिए जंग लड़ता है, तो कहना पड़ेगा कि मौलवी एक सच्चा राष्ट्रभक्त था। न तो उसने किसी की कपटपूर्ण हत्या करायी और न निर्दोषों और निहत्थों की हत्या कर अपनी तलवार को कलंकित किया बल्कि पूरी बहादुरी, आन, बान, शान से फिरंगियों से लड़ा, जिन्होंने उसका मुल्क छीन लिया था।’
फैज़ाबाद के स्वतंत्रता सेनानी रमानाथ मेहरोत्रा ने अपनी किताब ‘स्वतंत्रता संग्राम के सौ वर्ष’ में लिखा है कि ‘…फैज़ाबाद की धरती का सपूत मौलवी अहमद उल्लाह शाह शाहजहांपुर में शहीद हुआ और उसके खून से उस जनपद की धरती सींची गयी तो बीसवी सदी के तीसरे दशक में शाहजहांपुर की धरती से एक सपूत अशफाक उल्ला खां का पवित्र खून फैजाबाद की धरती पर गिरा। इतिहास का यह विचित्र संयोग है… एक फैज़ाबाद से जाकर शाहजहांपुर में शहीद हुआ तो दूसरा शाहजहांपुर में जन्मा और फैज़ाबाद में शहीद हुआ।’ शहीद–ए-वतन अशफाक ने अपनी जेल डायरी में एक शेर दर्ज किया है, ‘शहीदों की मजारों पर जुड़ेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।’ दिल पर हाथ रहकर आज अपने आप से खुद पूछें, इस अजूबे फकीर के वारिसों को शहादत पर याद करने की कितनी फुर्सत है? इस मुक्ति योद्धा की जिंदगी के ज्यादातर पन्ने अब भी रहस्य के गर्भ में हैं।
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